Friday, May 25, 2012

जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
जैसे कोई मीठी लोरी
गा के मुझको सुनाये
जैसे हो ख्वाब सुनहरे
पलकों के साए साए
जैसे गुमनाम फ़रिश्ते
देते मुझको दुवाएँ
         जाने ये किसकी सदा
          मेरे सपनों में आये
हौले हौले बजती हो
जैसे मंदिर की घंटी
आसमान से उतरी हों
जैसे परियां सतरंगी
तारों की चुनर ओढ़े
घूँघट में चाँद छुपाये
नूर की बारिश जैसे
मेरा वजू कर जाए
           जाने ये किसकी सदा
           मेरे सपनों में आये
अनजानी राहों से
कोई मुझको पुकारे
अनहद के नाद गूंजे
अनलहक के गूंजे नारे
जैसे मीरा के घुंघरू
बजते हों संग इकतारे
जैसे जमुना किनारे
राधा, कान्हा पुकारे
      जाने ये किसकी सदा
      मेरे सपनों में आये ...

Thursday, May 24, 2012

जीवन में सर्वश्रेष्ठ करने की चाहत ने इस तरह से जकड के रखा कि  मैं कभी कोई काम पूरा नहीं कर पाया !लिखना और मिटाना,लिखना और फाड़ना यही सदा  मेरी नियति रही !दो अधूरे उपन्यास,कई  अधूरी कहानियां और लेख सदा मेरा मुंह चिढ़ाते  रहे !आखिर एक दिन बैठकर मैंने सब आग के हवाले कर दिया ! मेरी हालत उस माँ  की तरह थी जो सालों से अविकसित भ्रूण अपने गर्भ में लिए घूम रही थी !वह बोझ उतार कर मुझे दुःख तो हुआ, लेकिन मैंने एक राहत भी महसूस की ! फिर सालों का अन्तराल पड़ गया मैंने कुछ भी लिखने की कोशिश नहीं की और घर,परिवार और नौकरी में रमा रहा पर साथ ही साहित्य अध्ययन भी चलता रहा जो की सदा से मुझे प्रिय रहा है ! !लेकिन मेरी रचनात्मकता मुझे हमेशा बैचेन किये रहती थी!आखिर 2008 से मैंने फिर लिखना शुरू कर दिया !शुरुआत मैंने अखबारों को भेजे जाने वाले छोटे छोटे पत्रों से की ,फिर मैं लेखनुमा बड़े पत्र लिखने लगा ! मुंबई में आतंकी हमले के खिलाफ मेरा एक लम्बा पत्र भास्कर में 'अभिव्यक्ति' कालम में  प्रकाशित हुआ,फिर छत्तीसगढ़िया के मुद्दे पर पर एक लेख भास्कर में ही प्रकाशित हुआ !लेकिन मैं अँधेरे में हाथ पैर मार रहा था और साहित्यिक उपलब्धि के नाम पर शून्य था !तभी जैसे चमत्कार हुआ !वह दिसम्बर 2009 का एक दिन था जब कबीर को पढ़ते पढ़ते अचानक मेरे भीतर एक कविता उतर आई !मेरे स्वभाव को देखते हुए शायद विधाता मुझे राह  सुझा रहा था !लेकिन ईश्वर के संकेतों को समझना इतना आसान भी नहीं !मैं स्कूल में पढ़ता था तो पद्य मुझे विशेष प्रिय थे! मैं अपनी हिंदी पुस्तक के सारे पद्य रट डालता था,लेकिन मैं कवि  बनूँगा ये मैंने कभी नहीं सोचा था !अनिर्णय के हालात में एक साल और बीत गया !आखिर दिसम्बर 2010 से मैं नियमित रूप से पद्य लिखने लगा !लगभग तीन दशकों के साहित्य अध्ययन ने मेरे भाषा ज्ञान को समृद्ध किया है और भावों की अभिव्यक्ति के तरीके सिखाये हैं !यही मेरी पूंजी है जिसके दम पर मैं कवितायेँ रचता हूँ ! इसके अलावा मेरी माँ ने मुझे बचपन में  जो धार्मिक संस्कार दिए थे, वे भी किसी पूंजी से कम नहीं हैं !युवावस्था के आरम्भ में ,अति आत्मविश्वास से आंदोलित मेरे मन में, उन संस्कारों के प्रति एक तरह का हिकारत भाव पैदा हो गया था! किन्तु आज उम्र के इस मोड़ पर जब मैं पीछे देखता हूँ, तो पाता हूँ , कि  बचपन के वे रामायण पाठ  और गायत्री मन्त्र का जाप ही वे पगडंडियां थीं,  जिन पर चल कर मैं आध्यात्मिक रहस्यवाद की गुफा तक पहुँच पाया !जिसकी झलक मेरी कविताओं में अनायास ही देखने को मिलती है !