Friday, May 25, 2012

जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
जैसे कोई मीठी लोरी
गा के मुझको सुनाये
जैसे हो ख्वाब सुनहरे
पलकों के साए साए
जैसे गुमनाम फ़रिश्ते
देते मुझको दुवाएँ
         जाने ये किसकी सदा
          मेरे सपनों में आये
हौले हौले बजती हो
जैसे मंदिर की घंटी
आसमान से उतरी हों
जैसे परियां सतरंगी
तारों की चुनर ओढ़े
घूँघट में चाँद छुपाये
नूर की बारिश जैसे
मेरा वजू कर जाए
           जाने ये किसकी सदा
           मेरे सपनों में आये
अनजानी राहों से
कोई मुझको पुकारे
अनहद के नाद गूंजे
अनलहक के गूंजे नारे
जैसे मीरा के घुंघरू
बजते हों संग इकतारे
जैसे जमुना किनारे
राधा, कान्हा पुकारे
      जाने ये किसकी सदा
      मेरे सपनों में आये ...

1 comment:

  1. बेहतरीन कविता मुबारक बाद अग्रवाल साहब।

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