जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
जैसे कोई मीठी लोरी
गा के मुझको सुनाये
जैसे हो ख्वाब सुनहरे
पलकों के साए साए
जैसे गुमनाम फ़रिश्ते
देते मुझको दुवाएँ
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
हौले हौले बजती हो
जैसे मंदिर की घंटी
आसमान से उतरी हों
जैसे परियां सतरंगी
तारों की चुनर ओढ़े
घूँघट में चाँद छुपाये
नूर की बारिश जैसे
मेरा वजू कर जाए
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
अनजानी राहों से
कोई मुझको पुकारे
अनहद के नाद गूंजे
अनलहक के गूंजे नारे
जैसे मीरा के घुंघरू
बजते हों संग इकतारे
जैसे जमुना किनारे
राधा, कान्हा पुकारे
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये ...
मेरे सपनों में आये
जैसे कोई मीठी लोरी
गा के मुझको सुनाये
जैसे हो ख्वाब सुनहरे
पलकों के साए साए
जैसे गुमनाम फ़रिश्ते
देते मुझको दुवाएँ
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
हौले हौले बजती हो
जैसे मंदिर की घंटी
आसमान से उतरी हों
जैसे परियां सतरंगी
तारों की चुनर ओढ़े
घूँघट में चाँद छुपाये
नूर की बारिश जैसे
मेरा वजू कर जाए
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
अनजानी राहों से
कोई मुझको पुकारे
अनहद के नाद गूंजे
अनलहक के गूंजे नारे
जैसे मीरा के घुंघरू
बजते हों संग इकतारे
जैसे जमुना किनारे
राधा, कान्हा पुकारे
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये ...
बेहतरीन कविता मुबारक बाद अग्रवाल साहब।
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