मैं कल रात ही मुंबई से वापस आया हूँ ,जहां मैं 'इंडिया हेज गाट टेलेंट ' के आडिशन में गया था !वहां मैंने अपनी एक गजल सुनाई !अपनी ये गजल एक माह पहले मैंने फेसबुक पर पोस्ट की थी ! IGT के लिए मैंने उसमें एक नया अंतरा और शुरुआती 'शेर' और जोड़ा था ! कलर्स टीवी के क्रिएटीव टीम की दो युवा महिलायें आडिशन ले रही थीं ! शुरू का शेर सुना कर जैसे ही मैंने गजल शुरू की , एक जो वरिष्ठ थी ,मुझसे बोली, आप शेर पे शेर सुनते रहेंगे तो कैसे चलेगा ? कुछ गा कर सुनाइए ! मैंने कहा मैं सिंगर नहीं हूँ ,मैं कवि हूँ ,और गीत गजल लिखता हूँ !उसने कहा फिर भी ,कुछ तो गाकर सुनाइये !तो मैंने उन्हें गाकर सुनाया !उन्हें शायद मेरी गजल ज्यादा पसंद नहीं आई !उन्होंने मुझसे कहा की आपको फोन द्वारा सूचित किया जाएगा !देखें क्या होता है !मेरी वह गजल पेशे खिदमत है जो मैंने वहां सुनाई थी ..
कोई देता है आवाज मुझे, या बजता है कोई साज कहीं
क्यों तन-मन मेरा गूंजे है भीतर-भीतर दिन रात कहीं
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
जैसे कोई मीठी लोरी
गा के मुझको सुनाये
जैसे हो ख्वाब सुनहरे
पलकों के साए साए
जैसे गुमनाम फ़रिश्ते
देते मुझको दुवाएँ
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
हौले हौले बजती हो
जैसे मंदिर की घंटी
आसमान से उतरी हों
जैसे परियां सतरंगी
तारों की चुनर ओढ़े
घूँघट में चाँद छुपाये
नूर की बारिश जैसे
मेरा वजू कर जाए
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
अनजानी राहों से
कोई मुझको पुकारे
अनहद के नाद गूंजे
अनलहक के गूंजे नारे
जैसे मीरा के घुंघरू
बजते हों संग इकतारे
जैसे जमुना किनारे
राधा, कान्हा पुकारे
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
मेरे मन के आँगन में
जैसे उतरी हो गंगा
लहरों की कल कल गूंजे
मन लगे तीरथ जैसा
स्वप्नों के भस्म से उठकर
जैसे पंछी गायें
प्रेम फिर रूप संवारे
जैसे मेरे घर आये
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये ....
कोई देता है आवाज मुझे, या बजता है कोई साज कहीं
क्यों तन-मन मेरा गूंजे है भीतर-भीतर दिन रात कहीं !
कोई देता है आवाज मुझे, या बजता है कोई साज कहीं
क्यों तन-मन मेरा गूंजे है भीतर-भीतर दिन रात कहीं
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
जैसे कोई मीठी लोरी
गा के मुझको सुनाये
जैसे हो ख्वाब सुनहरे
पलकों के साए साए
जैसे गुमनाम फ़रिश्ते
देते मुझको दुवाएँ
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
हौले हौले बजती हो
जैसे मंदिर की घंटी
आसमान से उतरी हों
जैसे परियां सतरंगी
तारों की चुनर ओढ़े
घूँघट में चाँद छुपाये
नूर की बारिश जैसे
मेरा वजू कर जाए
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
अनजानी राहों से
कोई मुझको पुकारे
अनहद के नाद गूंजे
अनलहक के गूंजे नारे
जैसे मीरा के घुंघरू
बजते हों संग इकतारे
जैसे जमुना किनारे
राधा, कान्हा पुकारे
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये
मेरे मन के आँगन में
जैसे उतरी हो गंगा
लहरों की कल कल गूंजे
मन लगे तीरथ जैसा
स्वप्नों के भस्म से उठकर
जैसे पंछी गायें
प्रेम फिर रूप संवारे
जैसे मेरे घर आये
जाने ये किसकी सदा
मेरे सपनों में आये ....
कोई देता है आवाज मुझे, या बजता है कोई साज कहीं
क्यों तन-मन मेरा गूंजे है भीतर-भीतर दिन रात कहीं !
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